नववर्ष का स्वागत विश्व भर में जोश-खरोश के साथ किया जा रहा है, जहाँ नववर्ष महोत्सव से ठीक पूर्व अपदस्थ ईराकी राष्ट्रपति सद्दाम को फांसी पर चढ़ा दिया गया तो वहीं नोएडा के एक घर में मिल रहे नर-कंकाल मानवता को शर्मसार कर रहें है। खेर जमाना आगे बढ़ने का है। "जो कुछ हुआ, हो चुका, भूलो और आगे बढ़ो" अप्रकाशित आधुनिक गीता का प्रमुख स्लॉगन है।
नववर्ष पर चहुँओर दुआएँ मांगी जा रही है, खुशहाली के लिए प्रार्थनाएँ की जा रही है, सामंजस्य और भावनात्मक लगाव का यह प्रवाह अनंत काल तक बहता रहे, इसके लिए प्रयास किए जाने जरूरी है। सबकुछ ऊर्जा पर निर्भर करता है। सामंजस्य बनाने के लिए जरूरी है कि आप दूसरे व्यक्ति में हमेशा अच्छाई और योग्यता देखें यानि आपका नज़रिया महत्वपूर्ण हैं। आपको दूसरों से सर्वश्रेष्ठ तभी प्राप्त हो सकता है, जब आप अपना सर्वश्रेष्ठ उन्हें देते हैं। जीवन में आनन्द पाने के लिए आप उन सभी चीजों और लोगों के साथ सामंजस्य बनाएँ, जो आपके सम्पर्क में आते हैं। भावनात्मक लगाव उस वक्त तक हासिल नहीं हो सकता, जब तक आपका प्यार शर्तरहित नहीं है। यदि दोनो पक्षों में से कोई भी पक्ष स्वार्थी है तो भावनात्मक बंधन ढ़ीला ही रहेगा। इसलिए जीवन में आनंद का रस घोलने के लिए अपने जीवनसाथी, बच्चों और मित्रों के साथ भावनात्मक बंधन को मजबूत करते रहें। हर व्यक्ति किसी ना किसी के प्रति जवाबदेह होता है। जवाबदेही वह गोंद है जो समाज को जोड़े रखती है। सामाजिक बंधन निर्धारित करता है कि हमें एक-दूसरे के साथ किस तरह व्यवहार करना चाहिए कि दूसरा पक्ष हम पर दोषारोपण नहीं कर सके।
कुछ समय पहले फ़ुरसतियाजी ने अपनी पोस्ट में हँसी की बेटी का जिक्र किया था जिसका नाम मुस्कान है और जिसमें हँसी से कहीं ज्यादा ज़ान हैं। अपने फ़ुरसतियाजी की तरह मिशनरीज ऑफ चेरिटी की संस्थापक मदर टेरेसा जी भी मुस्कान को ही सबसे बड़ी दवा मानती थी। मुस्कान की कोई कीमत नहीं है, मगर यह बहुत कुछ देती है, यह देने वाले को गरीब किये बिना पाने वाले को अमीर कर देती है। यह मनोवैज्ञानिक असर दिखाती है और जीवन में उल्लास भर देती है। अगर आप मुस्कुराने की आदत डाल लेंगे तो खुद को प्रसन्नचित भी महसूस करेंगे। मुस्कुराने से एक और फायदा है, आप जितना मुस्कुराते हैं, असफलता का डर उतना ही कमजोर पड़ता जाता है। असफलता का डर हमें सफलता की कोशिश करने से रोकता है। हारने का डर हमें जीतने का प्रयत्न करने से रोकता है। लोग क्या सोचेंगे, इस बात का डर हमें बहादुरी से आगे कदम बढ़ाने से रोकता है। सबसे बड़ी बात कि, डर आशा का गला घोंट देता है। आशावाद हमारे मस्तिष्क को नकारात्मकता से दूर ले जाता है। जब आप आशावादी होते हैं तो अपनी समस्या को सुलझाने के बारे में विचार करते हैं, व्यर्थ की आलोचना करने में समय बर्बाद नहीं करते। विश्वास की जड़ें अक्सर इस तर्कहीन आशा में होती हैं कि सब कुछ ठीक हो जाएगा। विश्वास की कमी की वजह से अपने सपनों का दम न घुटने दें।
नववर्ष पर तरकश का चिट्ठाकारी के प्रोहत्साहन के लिए किया जा रहा प्रयास भी सरहानिय है, हाँलाकि मुझे 2006 के सर्वश्रेष्ठ चिट्ठाकारों की सूचि में जगह नही मिली, मगर फिर भी मेरा जो उत्साहवर्धन हुआ है, मेरे लिए अमूल्य है। सूचि में जो आश्चर्यजनक पहलू रहा वो यह कि कविता लिखने वाले चिट्ठाकार स्थान नहीं बना पाये, अकेले गुरूदेव ही डटे है। सभी जज इतने मंजे हुए चिट्ठाकार है कि यह कहना भी तर्कसंगत नहीं लगता कि ऐसा इसलिए है कि उनमें से कोई कवि नहीं है क्योंकि कवि न होते हुए भी सभी कविता की गहराई को समझते है। जिस प्रकार चुटकले और सरदार एक दूसरे के पर्याय बन गये है वैसे ही कवि और बोरियत। आजकल कविता सुनने या पढ़ने वाले को "कवि-तड़ित-प्राणी" की संज्ञा दी जाने लगी है और काव्य से श्रोताओं का संहार करना ही कवि-धर्म माना जाने लगा है, मगर यह सत्य नहीं है. वेदों में लिखा है - "उर्ध्वश्वत्थमूलमिदं वृक्षं" - कवि लोग भी वैसे ही हैं, इनका मूल उपर है ब्रह्म में... खेर अभी भी गुरूदेव डटे हुए हैं, वे सभी प्रतिपक्षियों को पराजित करने को उद्यत हैं। विजय का वरण वे ही करेंगे। अब कवि मताधिकार का प्रयोग करेंगे, गुरूदेव का विजय होना निश्चिंत है। श्रीशजी, भुवनेशजी के लिए दिल बहुत खुश है, आखिर बहुत कम समय में उन्होने अपनी एक खास जगह बना ली है। अब आगे मुकाबला और भी दिलचस्प होगा।
नववर्ष पर सभी को हार्दिक शुभकामनायें देते हुए कुछ पंक्तियाँ गुनगुनाना चाहूँगा -
ढ़ल गया दिन ढ़ूँढ़ता था
सपनों में खोया रहता था
ना आए पिछे साया भी
पदचिन्ह अपने मिटाता था
डर को अब भगायेंगे
जश्न नववर्ष का मनायेंगे
संबोधन पुराना घेरता मन को
ज्यों प्रवासी लौट आया घर को
रहा गया कृषक बीज बोए बिन
तकता रहा त्यों मैं बदली को
खुशी के जाम छलकायेंगे
जश्न नववर्ष का मनायेंगे
कुछ फैसले सुनाकर जो
विश्वास जगाया जनता में
नहीं बच पाए मंत्री-संत्री
धकेला पिछें सलाखों के
बस यूँही न्याय चाहेंगे
जश्न नववर्ष का मनायेंगे
क्या औकात है किसकी अब
हुआ जरूरी तो बतलायेंगे
मिलजुल कर रहेंगे हम
भारत को जन्नत बनायेंगे
जश्न नववर्ष का मनायेंगे
जश्न नववर्ष का मनायेंगे
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Monday, January 1, 2007 |


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