इस जग में जग भर-भर के मिलेगा तुझको ज्ञान
अमृत होगा, विष भी होगा, ध्यान से करना पान
मिठा लगे सो अमृत होय, कड़वा लगे सो विष
ऐसा ना होगा हरदम "गिरि" रखना इसका ध्यान
इस जग में जग भर-भर के मिलेगा तुझको ज्ञान
आँखे देखेगी, कान सुनेंगे, बोलेंगे कण्ठे-द्वार
सच दिखे ना, सच सुने ना, ना ही बोले यार
कैसे पता लगेगा फिर सच का "गिरि" कैसे होगा ज्ञान
इस जग में जग भर-भर के मिलेगा तुझको ज्ञान
आ गया जो इस दूनियाँ में एक दिन वापस जाएगा
साथ न लाया कुछ साथ न होगा, खाली हाथ जायेगा
जाना होगा "गिरि" तुझको भी पर पथ का कैसे होगा ज्ञान
इस जग में जग भर-भर के मिलेगा तुझको ज्ञान
अग्न जलाती है सबकुछ, अग्न मिटाती भूख है
पानी बुझाता प्यास तो पानी में जाते हम डूब है
एक भला है, एक बूरा है, दोनो एक पर दो रूप
अब किसका है कैसा रूप, "गिरि" तौल-मौल के जान
इस जग में जग भर-भर के मिलेगा तुझको ज्ञान
इस जग में जग भर-भर के मिलेगा तुझको ज्ञान
Tuesday, December 12, 2006 |
Posted by
गिरिराज जोशी
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कविताएँ
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