दुल्हन (हाइकु)

Thursday, December 14, 2006 |

किया श्रृँगार
चली संग साजन
पहने हार 


पल में छूटी
बचपन की यादें
लो डोली उठी


बाबुल रोया
देके विदाई फिर
चैन से सोया


लुटाया धन
बदले में खुशी का
लिया वचन


थोड़ा शर्मायी
साजन से छुप के
आँख मिलाई


दिल धड़का
लगा साजन आये
कुछ खड़का


दिन तो बीता
कैसे रात बीतेगी?
मन चिढ़ाता


धड़का जिया
अब हाइकु मेरे
प्राण है पिया

0 comments: