जाँच प्रविष्टि - कृपया टिप्पणी ना करें

Thursday, December 28, 2006 |

श्रीशजी बोले तो अपने में ज्ञानार्जन करने के बाद विचार आया कि विंडो लाईव राईटर कब का डाऊनलोड किया हुआ डाऊनलोड फोल्डर में पड़ा है, क्यों ना अब इसे इंस्टाल कर ही लिया जाये.

विचार अगम-अगोचर हो उससे पहले ही हमने इसे इंस्टाल कर लिया है और इसका उपयोग करते हुए यह जाँच प्रविष्टि भी लिखा हूँ. कृपया टिप्पणी ना करें का टैग लगा दिया है फिर भी मैं जानता हूँ कि टिप्पणियाँ तो आयेगी ही.

अब जब टिप्पणियाँ आयेगी तो हम यह घोषणा कतई नहीं करेंगे कि हम इस जाँच प्रविष्टि को कुछ समय पश्चात मिटा देंगे.

समयाभाव है और कार्यभार अत्यधिक सो शायद नववर्ष तक कोई और पोस्ट ना कर पाऊँ :( .

आप सभी को नववर्ष की ढेंरो शुभकामनायें।

चुनाव (क्यों? और क्या?)

Sunday, December 24, 2006 |

चुनावों की हुई घोषणा बढ़ गई है चहल-पहल
कोई बैठा चुपचाप अकेला कोई गया मार्ग बदल
कल तक कहते होते हैं नेता तो घृणा के ही लायक
आज बन बैठे ठेठ देसी नेता खुलकर रहे दल-बदल

राज करो, फ़ूट डालो और चर्चा में रहने की नीती
कवि ह्रदय अटल जी को कहते रास न आई राजनीती
टिप्पणियों का लालच देकर आयोग का मजाक बनाते
सन्यास की कर घोषणा सरे आम जजों को धमकाते

नारे लगवाते, दारू पिलाते, सुन्दरियों के फोटू दिखलाते
चिट्ठा जगत है शांत सुनहरा उसमे ये क्यों भांग मिलाते
पुरस्कारों मे खोकर क्या कलम भी रंग गई नेता रंग
गले मिलाते थे कल तक जिनकों आज हैं तलवार चलाते

भिखमंगो सा हाल हुआ है एक वोट तो हमको दीजिये
अरे एक क्या सौ मिलेंगे ज़रा लेखनी पे भरोसा कीजिये
लिखते रहिये बिन रूके-थके सबके मन को टटोलकर
फिर जो भी जितें श्रृद्धा से कलम को समर्पित कीजिये

अपनेपन का चोला पहने ये चुपचाप शांत जो बैठें है
कुछ भी नहीं कहना कहकर सबकुछ ही कह जाते हैं
वोट खिंचने की ताकत से मुंण्डलियाँ इनकी सारोबार
फिर क्यूँ छोड़ साथ उसका ये व्यंग्य बाण चलाते हैं

चुनावों की घोषणा से क्या तरकश की यही मंशा थी
या फिर लेखनी का होगा प्रदर्शन ऐसी कुछ अपेक्षा थी

कृपया अन्यथा ना लें

Wednesday, December 20, 2006 |

आजकल गपशप पर "डिस्कशन" चल रहा है, पंकज भाई ने सिनेमा वालो की तर्ज पर चार लाईनों में नोमिनेशन क्या माँगा, "डिस्कशन" शुरू हो गया। गुरूदेव कुछ ज्यादा उतावले नज़र आए और हँसी-हँसी में वोट भी माँग लिया। खेर जो भी हो आजकल गपशप पर हिन्दी के महान से लेकर महानतम चिट्ठाकार (अब जो हिन्दी लिखता है वो महान तो है ही :), नोट : स्माईली लगा दी गई है, कृपया अन्यथा ना लें) कुछ इस प्रकार मिलते हैं -

नमस्कार, कैसे हैं?

अच्छा हूँ, आप कहें? क्या सेवा कर सकता हूँ?

अरे नहीं-नहीं कुछ खास नहीं, बस अपना नाम नोमिनेट करवाना था। :)
(स्माईली पर विशेष ध्यान दिया जाये)

क्यों नहीं, आप तो वाक़ई इस साल के बेहतरीन चिट्ठाकार हैं.

जी शुक्रिया.

हा हा हा! कैसा शुक्रिया भाई? आप मेरा करो मैं आपका.... इस हाथ ले उस हाथ दे

जी जरूर. अब आज्ञा दें कुछ जरूरी काम है, बाद में बात करते हैं.

हाँ, मुझे भी.

अब दोनों को ही क्या जरूरी काम है यह तो हम सब जानते है और वो दोनो भी, इसलिए बिना इसमें उलझे हम आगे बढ़ते हैं, मान लीजिये यदि यही गुहार सभी चिट्ठाकार अपनी-अपनी शैली में लगाये तो कैसे लगायेंगे -

सबसे पहले गुरूदेव (इसे वो अपनी पोस्ट में जगह नहीं दे पाए थे, उनकी डस्टबिन में से उठाकर लाया हूँ)
तरकश पर जा कर नोमिनेट हमको कीजिये
बदले में १०० मुँण्डलियाँ अपने नाम कीजिये
अपने नाम कीजिये और छापिये जहाँ चाहे दिल
पर बेस्ट चिट्ठाकार का पुरस्कार जाये मुझे मिल
कहे "समीर" कि जो भी करेगा मुझे नोमिनेट
सभी गृह-नक्षत्र और कुण्डली मुफ़्त करूँगा सेट

यह मुण्डली उनकी डस्टबिन में से उठाकर ज्योंही में निकलने लगा, मेरी उनके नज़र कम्प्यूटर पर पड़ी तो इसका भाग -2 (सुधरा हुआ रूप) भी कॉपी कर लाया -
नामिनेट हमको करे, जो तरकश पर जाय
१०० मुण्डलियों की गड्डी, अपने नाम कराय
अपने नाम कराय फिर छापो अपने चिट्ठे पर
हमको चिट्ठाकार कहे, आप हों अबसे कविवर
कहे समीर कि बस जितवा दो हमको आप
कुण्ड़लियां तुम पर लिखूँ, गृह-नक्षत्र दूँ नाप

अब यदि यही चस्का अपने दस्तक वाले नाहर भाई साहब को लग जाए तो -

- घोषणा -



यदि किसी भी कारणवश या अकारणवश यह पुरस्कार हमें नहीं मिला तो हम अपने पूर्ण होशोहवास में यह घोषणा करते है कि चिट्ठाजगत से सन्यास ले लिया जायेगा. कृपया हमें मजबूर ना करें।

(अब यह तो सभी जानते है कि वो आजकल लिखता ही कितने है. :) खैर स्माईली लगा दी है)

अब बात की जाए अपने श्रीश भाई साहब, मतलब ई-पंडितजी की -
आज की इस क्लाश में मैं आपको सिखाऊँगा कि तरकश पर 2006 के सर्वश्रेष्ठ चिट्ठाकार को नोमिनेट कैसे करें -

1. सबसे पहले अपना ई-मेल अकाउण्ट खोले.
2. अब To वाले टेक्सट बॉक्स में contact@tarakash.com लिखें
3. subject में "2006 के सर्वश्रेष्ठ चिट्ठाकार के लिए नोमिनेशन" लिखें
4. body वाले भाग में यह लिखें -

मैं 2006 के सर्वश्रेष्ठ चिट्ठाकार के रूप में इन दो चिट्ठाकारों को नोमिनेट करता हूँ -

1. श्रीश
2. ई-पंडित

और send पर क्लिक कर दें, आपका काम हो जायेगा.

अब मिलिये अपने हास्य मंत्री उर्फ़ वकील बाबू उर्फ़ भुवनेश शर्मा से -
पैंदीलालजी अपनी मस्ती में टहल रहे थे। हमने समझाया मत टहलिये, आज न्यायपालिका धड़ाधड़ फैसले सुना रही है और आप अकारण टहल रहें है और वो भी मस्ती में! आप पर जानबुझकर मस्ती में टहलने और अपना समय नष्ट कर भारत के समुचित विकास में बाधा पँहुचाने का मुकदमा चलाया जा सकता है। हमारा इतना कहना ही था कि उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। हमारी बात मान लेते तो शायद...

(अरे भाई बेचारे को समय ही कहाँ मिला था. :) स्माईली लगा दी है)
खेर सुना है आजकल 2006 के सर्वश्रेष्ठ चिट्ठाकार के लिए नोमिनेशन हो रहा है, अब चुँकि हम खुद तो अपना नाम नोमिनेट नहीं कर सकते, इसलिए बंधुजनों से निवेदन है कि हमारा नाम भेज दें. कहीं ऐसा न हो कि पैंदीलालजी की तरह ...

शैलेश भारतवासी जी -
प्रिय
तुम जो मुझे देख रही हो
शर्माकर आँखे मूदें
मैं भी तो अधीर हूँ
बहुत कठिन तो नहीं
तुम दूर भी नहीं
मगर प्रिये
कौन सुनेगा मुझे
कौन समझेगा इसे
तुम मुझे मिलो
या ना मिलो
मैं हमेशा तुम्हारा हूँ
और तुम मेरी
अनंतकाल तक ...

(अब यहाँ शैलेशजी किस प्रिय की बात कर रहें है, यह बताने की आवश्यकता नहीं लगती. :) स्माईली लगा दी है)
प्रमेंन्द्र प्रताप सिंह उर्फ़ महाशक्तिजी -
मैं जानता हूँ
तुम नहीं मिलोगी मुझे
मर कर भी नहीं
मगर
मैं मरना नहीं चाहता
पाना चाहता हूँ
जीते जी तुमको
कहो क्या करूँ
कैसे मरूँ? (विशेष ध्यान दें, :) स्माईली लगा दी है)
क्या कोई नहीं
जो पँहुचा सके मेरा संदेश
और तुम चली आओ मेरे पास...

(क्यों भाई तुम खुद काहे नहीं चले जाते. नोट : स्माईली उपर देखें)

और भी बहुत सारे मित्रगण है जिनके ख्यालात लिखने का मन हो रहा है मगर क्या है कि पता ही नहीं चल रहा कि किसने कब ब्लॉग लिखना शुरू किया. सभी जगह चक्कर लगा आये मगर जवाब मिला कि एक-एक ब्लॉग खोलो और उनके Archive में जाकर देखो। ( :( स्माईली नोट  करें)

भेज दो नाम
कर दो नोमिनेट
मिलके सारे

जीतेगा कौन?
शत शत नमन
लगाओ नारा

सबसे अच्छा
शत शत नमन
सबसे प्यारा

अरे अनुरागजी आप कहाँ रह गये थे. मेरे लिए इतने सुन्दर हाइकु लिखने के लिए शुक्रिया. (नोट : स्माईली नहीं हैं)

अंत मैं आप सभी से निवेदन है कि अनुरागजी की पगडंडी पर चलकर उनका दिल अवश्य रखें, आखिर पहली बार वो आपसे कुछ करने के लिए कह रहें है।

सागर भाई को हँसाना है

Sunday, December 17, 2006 |

कल धर रूप प्रभू कृष्ण का
सागर भाई अचानक प्रकट हुए
ज्यों दिये ज्ञान प्रभू अर्जून को
वैसा ज्ञान दे हमको कृतार्थ किये


सागर भाई के विराट रूप को
मैं चरण-कमल वंदन करता हूँ
ज्ञान अनमोल मिला जो मुझको
अब आपके सम्मुख रखता हूँ -


कविता पढ़ा-पढ़ाकर अपनी
पहले मुझको व्यथित किये
मुझे हँसाओ कहकर फिर
भ्राताजनों के अंगुली किये


कितने पाप गिनाऊँ तुमको
क्या कुछ नहीं तुम किये हो?
भुवनेशजी थे इंसान कलतलक
उनकों तुम मंत्रीभार दिये हो


परीक्षाभार पहले से था सर पर
फिर भी प्रतिकजी से लिखवाया
लगावाये चक्कर विदेशों के
पर सबने ही अंगुठा दिखलाया


था खुब विश्वास बन्धुजनों पर
आपने बंद मुट्ठी को खुलवाया
फिर यह कड़वा अनुभव सारा
कह-कहकर चिट्ठे पे लिखवाया


मुझको भी फिर झांसे में लेकर
गृहस्थ जीवन का राज उगलवाया
जीवन संगनी से पहली बार
बिना किसी हथियार पिटवाया


इतने में कहाँ तुम्हे चैन मिला
संजय, शुएब को भी ललचाया
रोये गिड़गिड़ाये दोनों बेचारे
फिर हाथ जोड़कर पिंड छुड़ाया


आंसू छलक गये फ़ुरसतियाजी के
पर तुमको ना नयन-नीर हुआ
तुम तो चल दिये हो धुन सवार
चाहे हँसी-हँसी में उनको पीड़ हुआ


यह सबकुछ जो तुमने किया कहो
क्या अब भी तुमको एहसास हुआ?
"सागर भाई को हँसाना है" कहकर
कैसे भ्राताजनों को परेशान किया?


हतोत्साहित करना नहीं मकसद मेरा
मैं तो प्रेम-पुष्प बिखराना चाहता हूँ
जब छू लो तुम बढ़कर अम्बर को
मैं उस पल में मुस्कुराना चाहता हूँ


दर्द मिलेंगा हर दिल में तुमको
काव्यमय चित्र ना बनाया करो
गर काव्य ही लिखना चाहो तो
तुकतुकजी सा कुछ लिखा करो


बहुत बहा चूके हो गम के आंसू
अब लेखनी में ऐसी जान भरो
बरसो से भूला जो हँसना-हँसाना
चहरे पर उसके मुस्कान धरो


भले रच दो महाकाव्य गम में
दर्द दिलों का न इससे मिटेगा
क्या बसेगा गम वहाँ तुम्ही बताओ?
जब कहीं हँसी का गुब्बार फटेगा


सागर ज्ञान दौड़ रहा है नशों में
कैसे?, यह हम जल्द ही बतलायेंगे
अब वो दिन मित्रों दूर नहीं जब
आप मेरे काव्य पर ठहाका लगायेंगे

दुल्हन (हाइकु)

Thursday, December 14, 2006 |

किया श्रृँगार
चली संग साजन
पहने हार 


पल में छूटी
बचपन की यादें
लो डोली उठी


बाबुल रोया
देके विदाई फिर
चैन से सोया


लुटाया धन
बदले में खुशी का
लिया वचन


थोड़ा शर्मायी
साजन से छुप के
आँख मिलाई


दिल धड़का
लगा साजन आये
कुछ खड़का


दिन तो बीता
कैसे रात बीतेगी?
मन चिढ़ाता


धड़का जिया
अब हाइकु मेरे
प्राण है पिया

हम तो यार बैठे थे…

Wednesday, December 13, 2006 |

हम तो यार बैठे थे पढ़नें की खातिर
पूनम की रात को छत पर जाकर
मौसम ने बदल दिया मिजाज अपना
कर दिया अंधेरा बदली ने आकर


हम तो यार बैठे थे...

परेशान थे हम बिजली भी ना थी
दीये में तेल और बाती भी ना थी
अंधेरे में डुबा था यह सारा शहर
उन्होंने कर दी रोशनी पर्दा उठाकर


हम तो यार बैठे थे...

बारिश भी थी, तुफां भी था
ऐसा हुस्न देखकर मैं हैरां भी था
उड़ गई किताबें, भीग गया बदन
बूत सा बन गया, ऐसा नूर देखकर


हम तो यार बैठे थे...

दिल भी नादां था ख्वाबों में खो गया
उम्मीदों के धागों से क्या-क्या बना गया
मगर खुशी ज़रा सी भी मंजूर न थी उनकों
तोड़ दिये ख्वाब सारे पर्दा गिराकर


हम तो यार बैठे थे...

थोड़ी देर किया हमने छत पर इंतजार
फिर सो गये यार हम तो उनको भूलाकर
मगर नींद भी कहाँ नसीब में थी आज
जगा दिया उन्होंने फिर सपने में आकर


हम तो यार बैठे थे...

अब तो अक्सर छत पे इंतजार करने लगे
उनकी एक झलक को बे-करार रहने लगे
उनका तो यार अंदाज ही निराला था
शर्माकर मुस्काते फिर छुप जाते पड़पाकर


हम तो यार बैठे थे...

कुछ दिनों तक यह सिलसिला यूँहीं चलता रहा
उनसे बात करने को यह दिल मचलता रहा
कुछ सुनाने को कहा गया जब मुहल्ले की एक सभा में,
बात दिल की कह दी हमने नज़्में सुनाकर


हम तो यार बैठे थे...

उनको भी हमारी महोब्बत से इनकार न था
पर फिर भी उनकी जूबाँ पर इकरार न था
कर गए दफ़न वो दिल की बात दिल में ही
छुड़ाके हाथ चल दिए "मजबूरी" जताकर


हम तो यार बैठे थे...

खुदा करें इस दूनियाँ में, कोई कभी "मजबूर" न हो,
"मजबूरी" का लेकर बहाना, कोई किसी से दूर न हो॥

इस जग में जग भर-भर के मिलेगा तुझको ज्ञान

Tuesday, December 12, 2006 |

इस जग में जग भर-भर के मिलेगा तुझको ज्ञान
अमृत होगा, विष भी होगा, ध्यान से करना पान
मिठा लगे सो अमृत होय, कड़वा लगे सो विष
ऐसा ना होगा हरदम "गिरि" रखना इसका ध्यान
इस जग में जग भर-भर के मिलेगा तुझको ज्ञान

आँखे देखेगी, कान सुनेंगे, बोलेंगे कण्ठे-द्वार
सच दिखे ना, सच सुने ना, ना ही बोले यार
कैसे पता लगेगा फिर सच का "गिरि" कैसे होगा ज्ञान
इस जग में जग भर-भर के मिलेगा तुझको ज्ञान

आ गया जो इस दूनियाँ में एक दिन वापस जाएगा
साथ न लाया कुछ साथ न होगा, खाली हाथ जायेगा
जाना होगा "गिरि" तुझको भी पर पथ का कैसे होगा ज्ञान
इस जग में जग भर-भर के मिलेगा तुझको ज्ञान

अग्न जलाती है सबकुछ, अग्न मिटाती भूख है
पानी बुझाता प्यास तो पानी में जाते हम डूब है
एक भला है, एक बूरा है, दोनो एक पर दो रूप
अब किसका है कैसा रूप, "गिरि" तौल-मौल के जान
इस जग में जग भर-भर के मिलेगा तुझको ज्ञान

सागर भाई को हँसाना है

Friday, December 8, 2006 |

कल सागर भाई गुगल गपशप पर आए और आते ही गुर्राने लगे। "कविता सुना-सुना कर बहुत बोर कर दिया, अब मैं हँसना चाहता हूँ।" सागर भाई की इच्छानुसार हम लगातार मसखरों से सम्पर्क कर रहें है कि वो इसका बीड़ा उठायें। इस कड़ी में आज वकिल साहेब (भुवनेश भाई) पहली किस्त लेकर आ रहें है उनका स्वागत जोर-शोर से कीजियेगा। यदि आपको हमारी बात पर विश्वास नहीं है तो यह देखिये मेरी उनसे गुगल गपशप पर हुई बातचीत का ब्योरा -

 

कैसे हो कविराज?
मैं व्यस्त हूँ, शायद आपने देखा नहीं, बोर्ड भी लगा रखा है


हाँ, पर हम डिस्टर्ब करने के आदी हैं


तो आदत बदलिये सरकार


नहीं बदलेगी
सजा के वक्त सिद्धु भी हँसते हुए अच्छे नहीं लग रहे थे, कभी-कभी आदतन ही हम भी सरदारों जैसा काम कर लेते है


लगता है आज आप मूड में हैं
क्यों आपके पास कोई आईटम है क्या?
आइटम मतलब?, आपके पास जगदीश भाटिया जी का आई डी हो तो दीजिए


यह कोई पानी का प्याऊ है जो मांगते ही पानी मिलेगा?, पहले बताओ कि क्या वास्ता है भाटियाजी से


नहीं मिलेगा तो हम जबर्दस्ती ले लेंगे, उनके पास शायद कुछ ई-बुक्स हैं


हमको का भारत का संसद भवन समझ रखा है जो जबरदस्ती करोगे और हम कछु नाहीं कहेंगे


और क्या?, आखिर न्यायपालिका तो हमारी ही है ना


हमारी है तो फिर आधा हिस्सा हमरा हुआ के नाहीं


कैसे हुआ?


कौनसी स्कुल में पढ़े हो भाई, तनिक भी ज्ञान नहीं है का


टाट-पट्टी वाले में, पेड़ के नीचे
तभी "टाट" पर "पट्टी" पड़ी है और उस पर "पेड़" के पत्ते


:-)


तनिक हटाओ इनको, और भेजे को बहार निकालकर ठीक से साफ करो, वरना सड़ जायेगा ससुरा
कर देते हैं गुरू काहे नाराज होते हो


ई हुई ना बात, अब बतलाओ का चाहिये तुमका
राजस्थानी आज बिहारी भाषा में कैसे?


ओ का है की हमका सिखने का बड़ा सोख है
तो ढंग से सीखेये ना


हुण असी पंजाबी च गल करांगे, तेनु पंजाबी औंदी है?


लगता है स्लेट बत्ती लानी पड़ेगी, हम भी कुछ सीख लेंगे, हमको अंगूठा लगाना आता है


ते जल्दी ले आई मेरे कौल ज्यादा टैम नी हैगा, पंजाबी च ते असी फटे चक दवांगे


गुरू बहुत ज्ञान मिल गया, अब तो आने की बजाय भागना ही उचित है


क्यों की गल होगी, मैनु द्स तां सही


????? ये बाउंसर किसने फ़ेंका मेरे ऊपर से
डिड यू नो इंग्लिस, देन टाक विद मी इन ओनली इंग्लिस :)
आई डिड नाट नो इंग्लिश


ओ. के, बंग्ला जानबो
लगता है आज कविराज छुट्टी पर हैं, आप कौन हैं महाशय?
आप कौन हैं महाशय? :)


भारत के प्रधान्मंत्री, और आप कौन?


मैं सोनिया गांधी :)


माफ़ करें सोनिया जी गलती हो गई, आपने बिहारी और बांग्ला कब सीखीं?
अरे बुद्धु, अब पार्टी को बिहार और बंगाल मै भी तो खड़ा करना है

------

मै तो आज बूरा फसेला हू बाप
क्या हुआ


सागर भाई ने बोला कि क्या सड़ेली कविताएँ सुनाकर मेरा भेजा दुखा रहे हो, मेरे को हँसना मांगता है
कहां है सागर भाई, अभी सबक सिखाता हूं, सुपर पी.एम से ऐसे बोला


अरे चुनाव आने वाले है भाई, पब्लिक डिमाण्ड पूरी ना करे तो क्या वादा तो कर ही सकते है
सागर भाई को कौन सी कविता पढ़ाई थी, कल वाली?


हाँ
सिरियसली कहूँ, कविता मुझे तो बहुत अच्छी लगी
शुक्रिया
आज आपको मेल भी करने वाला था कि कविता बहुत ज्यादा पसन्द आई, बहुत दिनों बाद इतनी अच्छी कविता पढ़ने मिली


तो किया काहे नहीं हमरा कलेजा नाचन लगता, सच कहत है
आप ऑनलाइन जो मिल गये


खेर फूदक तो अभी भी रिया है :)

---------
अब सागर भाई को कैसे हँसाया जाए सरकार, उनकी ओर से डिमाण्ड आई है, मेरे भेजे मै कुछ आ नही रहा और आपका पत्तों के ढ़ेर में सड़ रहा है।


आप कोई मसखेरे हैं क्या, जो दूसरों को हंसाने का ठेका लें
अरे भाई चुनाव आ रहे है, करना पड़ता है, तुम नहीं समझोगे


गोली मारो चुनाव को
काहे भईया, तुमका भी नटवर की तरह् पार्टी से निकलना है का, चुनाव हमारा पुस्तेनी बिज़नस है


तो ऐसे काम नहीं चलेगा


फिर कैसन चलेगा


बंदूकों के लैसेंस बनवा लो और पनहीं चलाना सीख लो, लट्ठ के जोर पे लड़ा जाता है चुनाव, आप चिट्ठे के जोर पे ल्ड़ना चाहेत हैं


लगता है अभी तक भेजा साफ नही किये हो, सागर भाई को हँसाने का समान मिल गया हमको
कहां से


इस गपशप को ब्लाग पर डाल देते है :)


वाह बड़े नेक विचार रखते हैं
कोनो तकलिफ है का


बिल्कुल जैसी आपकी मर्जी
एक काम करिये आप ही डाल दीजिये


अरे नहीं गुरू ठेका आपने लिया है, आप ही डालिए


तो क्या हूआ सरकार, हम अपनी पोस्ट को रिडायरेक्ट कर देंगे। ओ का है की हास्य मे हमरा हाथ थोड़ा तंग है, और आप तो महारथी ठहरे इस विधा के।
काहे के महारथी आपको पता नहीं है एक राज की बात, ये जो सब मेरे चिट्ठे पर आता है वो सब चोरी का माल है, अपन तो बस चिपकाने का काम जानते हैं।


तो इसे भी चिपकाईये ना हुजूर
नहीं गुरू


हाँ सरकार
ठेका आपको मिला है


और हमने आपको सब ठेका दिया :)


ऐसे नहीं चलेगा गुरू, हम ठहरे चोर आदमी ठेका वेका हमसे नहीं होगा


आप भाग रहे है


चोर को भागने का अभ्यास करते रहना चाहिए
आप लिख रहे है ना?


नहीं, आप लिखें, हमारे कंधे कमजोर हैं इतना बोझ न डालें
अरे आप तो भारतीय क्रिकेट टीम की तरह करने लगे तु रन बना, तु रन बना, आप लिख रहे है ना?, मेरी इतनी सी बात भी नहीं रखेंगे भाई, इतना भाव क्यों खा रहे हो?
माफ़ कीजिए डेस्क पर नहीं था, और कनेक्शन भी कट गया था, अब बोलिए क्या कह रहे थे
तो बोर्ड टांगकर जाना चाहिये था ना, ,खाली पीली टाईम खोटी किया
गलती हो गई


आप लिख रहे है ना?, मेरी इतनी सी बात भी नहीं रखेंगे भाई, इतना भाव क्यों खा रहे हो?
सॉरी, क्या लिखना है? आप आदेश करें
सागर भाई को हँसाना है बस और ई ससुरा मेरे बस में नाहीं
बताईये तो कैसे हंसायें
ई हमको पता होता तो हम खुद ही नहीं हँसा देते
हमें पढ़कर तो वैसे ही हंस पड़ते हैं वे
हाँ सो तो है, तुसी लिखते बड़ा सोणा हो


धन्यवाद, कल लिखूंगा नयी पोस्ट, आज जरा व्यस्त था
अरे नाही, आज ही हँसाना है, ई गपसप को ही मिर्च मसाला लगाकर छाप दीजिये, चाहे जो कीजिये, , मगर सागर भाई को आज ही हँसाना है


ठीक है ऐसा ही कर देंगे, बस शीरषक बता दें
"सागर भाई को हँसाना है" कैसा रहेगा
हां अच्छा है, पर कल सुबह तक पढ़ पायेंगे वे
अरे नही, वो आनलाईन है, अभी पोस्ट कीजिये, 10-15 मीनट में
अरे इतनी तो मेरी स्पीड नहीं, कुछ चुटकुलों की लिंक ही दे दें, अभी कुछ काम कर रहा हूं
:(

क्या कलपित चित्र बनाऊँ

Wednesday, December 6, 2006 |

गुरूदेव की प्रविष्टि "इक धुँआ धुँआ सा चेहरा" पर टिप्पणी करने के लिए कुछ सोच ही रहे थे कि कुछ भावोँ, सवालोँ ने हमेँ घेर लिया. हम बिना टिप्पणी किये उल्टे पाँव लौट आये और मन के भावोँ को शब्दोँ का जामा पहनाने की कोशिश करने लगे -

इसे पढनेँ से पहले गुरूदेव की यह प्रविष्टि अवश्य पढेँ -

इक धुँआ धुँआ सा चेहरा
जुल्फों का रंग सुनहरा
वो धुँधली सी कुछ यादें
कर जाती रात सबेरा।


इक धुँआ धुँआ सा चेहरा…… आगे यहाँ पढेँ

*************




क्या कलपित चित्र बनाऊँ

यादों की अभिव्यक्ति अनोखी
कैसे? हम कुछ कह पायेगें
पाँव धरा है अभी पगडंडी पर
राह कैसी क्या बतलायेगें


सफ़र तय कर लें ज़रा तो
कलम खुद ही चल पड़ेगी
हर कदम का लेखा-जोखा
इठला-इठला कर बतायेगी


यह धुँआ धुँआ सा चेहरा
शायद मुझको भी तड़पाये
या फिर कोई जुल्फ सुनहरी
मेरी यादें रंगीन बनायें


कैसा होगा यादों में जीवन
यह कैसे अभी बतलाऊँ
कवि हूँ तो कहो अभी
क्या कलपित चित्र बनाऊँ


जीवन के ये रंग अनोखे
जाने किसको क्या दिखलाये
कहीं सपनों में है जुल्फ सुनहरी
कोई यादों में सुलझाये


बचपन तो बीता निरा ठाला
कुछ जवानी में तो कर जाऊँ
शायद मैं भी बुढ़ापे में कभी
यों यादों को चित्रित कर पाऊँ


******************

गड़बड़ घोटाला

Saturday, December 2, 2006 |

मैँ अपने नये घर पर लिखने के लिए शुभ मुहुर्त देख ही रहा था कि यह दिखा, रहा नहीँ गया सो बिना मुहुर्त के ही फटागफट पोस्ट कर दिया, अब आप भी इसे देखेँ -(ऐडवांस पोस्ट)

 

hindiblogs.gif

 

 

बहुत जल्द अपने पुराने अन्दाज मेँ दनादन लिखना शुरू कर दूँगा, ऐसा विश्वास है.