वर्ल्ड-कप से औपचारिक विदायी हो जाने के बाद एक हिन्दुस्तानी होने के नाते भारतीय टीम का जोश-खरोश से स्वागत करना मैं अपना नैतिक दायित्व समझता हूँ। मैं जानता हूँ भारतीय रण-बाँकुरों का भारत वापस लौटना अब तक का सबसे साहसिक कार्य है। उनके इस साहसिक कार्य में मैं हमेशा उनके साथ हूँ। वर्ल्ड-कप में शामिल अन्य टीमों को तो यह आभास भी नहीं होगा कि भारतीय टीम के लिए इस प्रकार स्वदेश लौटना वर्ल्ड-कप जीतने से भी बड़ा साहसिक कार्य है। भारतीय टीम शुरू से ही बड़ा सोचती आयी है इस कारण बड़ी सोच रखते हुए बड़ा साहसिक कार्य किया है। ऐसे जाबांज रण-बांकुरों को शत् शत् नमन!
भारतीय टीम के पास इस मुश्किल कार्य से पार पाने का माद्दा है, साहस है। सारा दोष ग्रेग के सर मढ़ देंगे, उसका विदेशी होना मुद्दा बन सकता है, विपक्ष इस मुद्दे पर भारतीय टीम का साथ देगा, इसके पूर्ण आसार नज़र आ रहे हैं। यह सबसे कारगर हथियार होगा, सभी जानते हैं कि विदेशी हमेशा ही विदेशी होता है और जब तक विदेशी है कोई भी देशी, दोषी नहीं हो सकता। जब मुद्दा बनेगा तो दूर तलक जायेगा, हमने तो यहाँ तक सुना है कि स्व. इन्दिरा गाँधी को भी लपेटा जा सकता है। उन्होने बांग्लादेश का निर्माण कर भारतीय टीम को इस प्रकार लौटने की नींव रखी थी। उनकी भारतीयता पर भी अब उंगलिया उठने लगी है, विपक्ष इसे सोची समझी साजिश करार दे रहा है। खेर राजनीती ही भारतीय टीम के सकुशल लौट आने में सबसे ज्यादा सहयोग प्रदान कर सकती है।
वैसे भी आप किस पर उंगली उठायेंगे? भारतीय टीम ने आशानुरूप प्रदर्शन ही किया है, वे अपनी पूर्ण योग्यता से ही खेलें है। यदि आप आंकड़ों में जमा सैंकड़ों शतकों को देखकर उम्मीद लगा रहे थे तो यह आपकी भूल थी। हमें तो खुश होना चाहिये कि ग्रेग जिंदा है और सकुशल है। आखिर हम इस बात से यह साबित कर पाये कि हम पाक से बेहतर है। और जब यह साबित हो गया कि हम पाक से बेहतर हैं तो वर्ल्ड-कप से बाहर होने का कैसा मलाल? यह टीम तो स्तुती करने लायक है। हार के बावजूद अपने विदेशी नायक को सकुशल रखने में कामयाब रही है, क्या यह कार्य कम साहसिक है?
कुछ लोगों का मानना है कि राहुल को कप्तानी छोड़ देनी चाहिये। सचिन, कुम्बले, गांगुली, अगरकर, सहवाग को टीम छोड़ देनी चाहिये। युवराज को कमान दे देनी चाहिये और नये चहरों से नयी टीम का गठन किया जाना चाहिये। मगर ऐसा सोचने वाले शायद भूल रहें है कि हारना भी साहसिक कार्य है। ऐसा कहने/सोचने वालों को भी एक बार इस दौर से गुजरने की जरूरत है। बरमूडा के खिलाफ 400 से ज्यादा रन इस बाद का सबुत है कि जब हम बरसते हैं तो खुलकर बरसते हैं, अब इस बात से क्या फर्क पड़ता है कि जब बरसना था तब क्यों नहीं बरसे?
अब भी कुछ नहीं बिगड़ा है, भारत के पास अभी भी समय है। अगले विश्व-कप की तैयारियाँ शुरू कर देनी चाहिये और इसी कड़ी में भारत को बांग्लादेश, श्रीलंका और पाकिस्तान पर आक्रमण कर फतह कर लेना चाहिये। इससे दो फायदे होंगे, एक तो अगले विश्वकप में इनसे हारने का खतरा नहीं रहेगा और दूसरा कुछ ऐसे अच्छे खिलाड़ी भी मिलेंगे जिनका काग़जी रिकार्ड नहीं है। अभी चार साल का समय है, हो सकता है पाकिस्तान भी इसी फिराक में हो। हमेशा शुरूआत करने वाल ही विजेता बनता है, हमें देरी नहीं करनी चाहिये। यदि किसी भी मौके पर लगे कि पाक हम पर भारी पड़ रहा है तो युद्ध फिक्स किया जा सकता है। एक बार युद्ध फिक्स होने के बाद पाक को आसानी से फतह किया जा सकता है। इस मामले में सटोरियों की मदद ली जा सकती है, आखिर उनमें भी तो कुछ भारतीयता बची होगी!
अब क्या लिखूँ? भारतीय टीम के इस साहसिक कार्य से गला भर आया है और आंसू (खुशी के) अंगुलियों से टपक रहें है। भारतीय टीम को इस बहादुरी भरे कारनामें को अंजाम देने के लिए बहुत-बहुत बधाई!!!
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Monday, March 26, 2007 |


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