चैन से लेटा
बर्फ़ की चादर में
नदी का पानी
बैठा सूरज
कोहरे की आड़ में
आँच सेंकता
राह अकेली
कोहरे में छुपी है
डरी-डरी सी
भंवरा उदास
कहाँ गई बगिया
मॉल खड़ा है
सजा सिन्दूर
बन रही दुल्हन
ओस की बूँद
Giriraj's Personal Blog
Wednesday, January 31, 2007 |
Posted by
गिरिराज जोशी
चैन से लेटा
बर्फ़ की चादर में
नदी का पानी
बैठा सूरज
कोहरे की आड़ में
आँच सेंकता
राह अकेली
कोहरे में छुपी है
डरी-डरी सी
भंवरा उदास
कहाँ गई बगिया
मॉल खड़ा है
सजा सिन्दूर
बन रही दुल्हन
ओस की बूँद
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हाइकु
Saturday, January 13, 2007 |
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गिरिराज जोशी
आदरणीय समस्त चिट्ठाकारों और पाठकों को मेरा प्रणाम,
अंतरजाल पर हिन्दी भाषा का प्रयोग जब से शुरू से हुआ है, तब से लेकर अब तक इसकी प्रगति काफी तीव्र गति से हो रही है और इसके लिए समस्त चिट्ठाकारों की मेहनत और पाठकों का असीम-प्रेम बधाई का पात्र है। हिन्दी चिट्ठाकारों का प्रगाढ़ प्रेम और हिन्दी के प्रति उनका समर्पण भाव अंतरजाल पर हिन्दी के उच्च भविष्य को सुनिश्चित कर रहा है।
अंतरजाल पर हिन्दी का प्रयोग कब और कैसे शुरू हुआ? इसके कोई प्रमाणिक आंकड़े मेरे पास उपलब्ध नहीं है मगर चिट्ठाजगत में इस क्रांति के जनक निश्चित रूप से देबू दादा ही हैं। एक समय था जब अंतरजाल पर हिन्दी के भविष्य को लेकर कईं आशंकाएँ पैदा होने लगी थी, कोई भी इसके भविष्य को लेकर पूर्णतया आसक्त नहीं था मगर “यूनिकोड” के प्रयोग ने सभी आशंकाओं को निरूत्तर कर दिया। आज अंतरजाल पर हिन्दी प्रयोगत्ताओं और हिन्दी पाठकों की बढ़ती संख्या देखकर समस्त चिट्ठाकारों का हृदय प्रफुलित होता है और यह निश्चय ही खुशी की बात है।
अक्षरग्राम समूह ने सर्वज्ञ के माध्यम से हिन्दी टंकण कैसे करें?, हिन्दी कैसे देखें?, अपना चिट्ठा कैसे बनाये? इत्यादि कईं महत्वपूर्ण प्रश्नों का समाधान कर न केवल नये तथा उत्साहित चिट्ठाकारों का भय दूर किया बल्कि उन्हें हिन्दी चिट्ठाकारिता में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रेरित भी किया, आज हिन्दी चिट्ठाकारों का बढ़ता परिवार इस समूह द्वारा की गई कठीन साधना का ही नतीजा है।
गुगल समूह चिट्ठाकार द्वारा जहाँ हिन्दी चिट्ठाकारों, पाठकों की हर प्रकार की (तकनीकी और गैर-तकनीकी) समस्याओं को सुनने, समझने और हल करने के लिए सभी चिट्ठाकारों की चौपाल सजायी गयी तो वहीं “नारद” (और अभी हाल ही में “हिन्दी ब्लॉग्स” व “सम्पादकजी” द्वारा भी) ने समस्त चिट्ठाकारों के मनोभावों को एक जगह संकलित कर उनके चिट्ठों तक पहुँचने का रास्ता सुगम बनाया।
कईं बार चिट्ठाकारों के सामनें ऐसे मुद्दे आते रहे, जिनके बारे में चर्चा करने की आवश्यकता महसूस हुई। इसके हल के रूप में पहले अक्षरग्राम पर चौपाल सजायी गयी तो फिर परिचर्चा का निर्माण हुआ। परिचर्चा के सदस्यों में निरंतर वृद्धि होती गई और इसी के साथ-साथ वैचारिक भिन्नता भी स्पष्टता से नज़र आने लगी। हर प्रकार के मुद्दे पर बहस व्यक्तिगत आलोचनाओं की तरफ़ झुकती रही और विचारों की लड़ाई के लिए बनाया गया मंच मल्ल युद्ध का अखाड़ा बनता गया। जब भी किसी सदस्य/मंदक/प्रबंधक द्वारा मुद्दे को व्यक्तिगत ना बनाकर वैचारिक ही रखने का आग्रह किया गया तो इसे विचारों का दमन करने की कोशिश बताया गया और व्यक्तिगत मल्ल युद्ध को जारी रखने के लिए अपने चिट्ठे का इस्तेमाल किया गया। ऐसे प्रत्येक सदस्य को लगा कि परिचर्चा पर उसकी आवाज को दबाया जा रहा है मगर उसके पास अपना चिट्ठा है जहाँ वो खुलकर बोल सकता है। मगर इससे जो सबसे अहम सवाल खड़ा हुआ वो यह कि फिर परिचर्चा जैसे मंच के निर्माण का उद्देश्य कितना सफ़ल हुआ?
चाहे जो भी हो, हिन्दी चिट्ठाजगत में जो चिट्ठाकारों का आपसी स्नेह पहले था आज भी कायम है और हम सबको कोशिश करनी चाहिये कि यह अनंतकाल तक बना रहें। परिचर्चा आज भी चर्चा के लिए सबसे उपयुक्त मंच है, मगर परिचर्चा के समस्त सदस्यों/मंदकों/प्रबंधकों को यह ख्याल रखना चाहिए कि तर्क और वितर्क के साथ-साथ कुतर्क भी चर्चा का हिस्सा भविष्य में भी बनें रहेंगे, इससे खिन्न होकर किसी को व्यक्तिगत शब्दों से सम्बोधित कर अपमानित नहीं करना चाहिये बल्कि परिचर्चा जैसे मंच को और भी लोकप्रिय बनाकर अंतरजाल पर हिन्दी-प्रयोग की प्रगति को और तीव्र गति प्रदान करने का प्रयास किया जाना चाहिये।
अंतरजाल पर हिन्दी-प्रयोग को बढ़ावा देनें में पत्र-पत्रिकाओं का भी खासा योगदान रहा हैं। अनुभूति, अभिव्यक्ति, सृजनगाथा, कृत्या, निरंतर, प्रभासाक्षी जैसी अनेकों पत्र-पत्रिकाएँ है जो अंतरजाल पर हिन्दी को प्रोत्साहित कर रही हैं। ऐसी सभी पत्रिकाओं का अपना एक बड़ा पाठक समुह है जो अपने हिन्दी-प्रेम के कारण प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इनसे जुड़ा हुआ है। अभी हाल ही में प्रभासाक्षी ने दैनिक हिट्स का जो कारनामा किया वो ना केवल प्रभासाक्षी के लिए अपितु समस्त हिन्दी चिट्ठाकारों/प्रेमियों के लिए सम्मान की बात है। मगर यहाँ हिन्दी भाषा की और रूख करते एक बड़े पाठक समूह को हमेशा संतुष्ट रखने की चुनौती भी आ खड़ी होती है। जाहिर सी बात है कि जिन पाठकों ने प्रभासाक्षी को इतने बड़े सम्मान से नवाजा है वो मात्र इसलिए तो हमारे चिट्ठे पर नहीं आयेंगे कि हम भी हिन्दी भाषा में लिखते है। अंतरजाल पर हिन्दी की प्रगति को और तीव्र गति प्रदान करने के लिए इस विषय पर एक बार पुन: विचार किया जाना आवश्यक है।
तरकश पर इस वर्ष आयोजित सर्वश्रेष्ठ चिट्ठाकार प्रतियोगिता में जितना महत्व पुरस्कारों का नहीं रहा उससे कहीं गुना महत्व इस बात का रहा कि अंतरजाल पर हिन्दी भाषा के प्रयोग या चिट्ठालेखन के बारे में आम जन तक प्रचार हुआ। समाचार की सुर्खियों मे रहने के कारण लोगों में इस ओर रूचि बनी और किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिये यदि इस वर्ष गुजरात से एक बड़ा समुह हिन्दी चिट्ठालेखन में कदम रखें। तरकश पर इस तरह के आयोजन के पिछे जो मकसद रहा था उसकी उम्मीद से ज्यादा पूर्णता हुई। चिट्ठाजगत में आपसी प्रेम अभी भी बना हुआ है इस बात कि पुष्टि हुई, समस्त चिट्ठाकारों को स्वाकलन कर अपने स्तर को उपर उठाने का मौका मिला और सबसे बड़ी तथा महत्वपूर्ण बात कि तरकश ही दैनिक हिट्स में अनुमान से कहीं अधिक इजाफा हुआ। निश्चित रूप तरकश एक व्यक्तिगत/सामूहिक पत्रिका है मगर इसका उद्देश्य व्यक्तिगत/सामूहिक लाभ का ना होकर अंतरजाल पर हिन्दी-प्रगति है। हिन्दी चिट्ठाकार तो वैसे भी तरकश के नियमित पाठक है फिर दैनिक हिट्स में यह इजाफा दर्शाता है कि एक बहुत बड़ा गैर हिन्दी चिट्ठाकार समूह तरकश पर आने लगा है और यह बात भी हम सभी को संयमित रहते हुए उच्चस्तरीय लेख़न करने को बाध्य करती हैं।
हिन्द-युग्म द्वारा भी हाल ही में अंतरजाल पर 'यूनिकोड' प्रयोग के प्रोत्साहन हेतु कविता को माध्यम के तौर पर चुना गया है। विद्यार्थी होते हुए भी अपना समय एवं धन अंतरजाल पर हिन्दी विकास में लगा रहे शैलेशजी का प्रयास भी निश्चित तौर पर प्रशंषनिय हैं जबकि जीवन के इस पड़ाव में इन दोनों का ही अभाव होता है। परिचर्चा पर शैलेशजी द्वारा कहा गया यह कथन – “यदि कुछ लोग पैसों का लोभ देकर भी हिन्दी-प्रयोग की तरफ मुड़ सकें तो भी हमारी ही जनसंख्या बढेगी” वर्तमान परिस्थितियों में, जब हमारा उद्देश्य संजाल पर मात्र हिन्दी-प्रयोक्ताओं की संख्या बढ़ाना भर है, उचित ही लगता है मगर इससे उन व्यक्तियों की संख्या को नहीं बढ़ाया जा सकेगा जो निस्वार्थ भाव से अंतरजाल पर हिन्दी की इस प्रगति में अपना योगदान दें सकें। फिर भी यह प्रयास कहीं ना कहीं हिन्दी भाषा के प्रयोग को प्रोत्साहित ही करेगा, इसलिए इसमें योगदान देकर मुझे बहुत खुशी हो रही है। हम सभी चिट्ठाकारों की राह एक है, कार्यशैली एक है और मंजील भी एक ही है फिर बार-बार उठ खड़े होते विरोधाभासों की वजह क्या है? आज यदि हम सभी चिट्ठाकार यह सोचने लग जायें कि हम नारद पर जाकर उसकी दैनिक हिट्स बढ़ा रहें है, परिचर्चा पर जाकर उसकी दैनिक हिट्स बढ़ा रहें है, तरकश पर जाकर उसकी दैनिक हिट्स बढ़ा रहे हैं, फलां चिट्ठे पर जाकर उसकी दैनिक हिट्स बढ़ा रहे हैं और ऐसा करके किसी ना किसी व्यक्ति/समुह को फायदा पहुँचा रहे है तो अंतरजाल पर हिन्दी का क्या होगा, यह बताने की जरूरत नहीं है। आज यदि नारद, परिचर्चा, तरकश या कोई भी अन्य हिन्दी संजाल विज्ञापन के द्वारा आय का एक स्त्रोत तैयार करते हैं तो यह हम सब के लिए खुशी की ही बात होनी चाहिए (ना कि हम इस सोच के साथ हम इसका विरोध करें कि कोई आर्थिक फायदा ले रहा है) क्योंकि विज्ञापन द्वारा आय का एक स्त्रोत तैयार करने से हम सबके द्वारा मिलजुल कर किया गया यह प्रयास स्वनिर्भर बनेगा और जो धन हम इन सब के लिए खर्च कर रहें है उसका इस्तेमाल अंतरजाल पर हिन्दी के प्रचार-प्रसार में किया जा सकेगा। यह सोच ही हमें अंतरजाल पर हिन्दी के उज्ज्वल भविष्य की ओर लेकर जायेगी।
हाल ही में जीतु भाई द्वारा किया गया प्रयास “ज्ञान का ख़जाना” भी इस दिशा में एक सकारात्मक कदम है, हिन्दी चिट्ठाजगत में कईं अनुभवी हस्तियाँ है जिनके पास ज्ञान का अथाह भण्डार भरा पड़ा है। ज्ञान के इस ख़जाने को एक जगह एकत्रित कर पाठकों को उपलब्ध करवाने से निश्चित रूप से पाठकों के लाभांवित होने के साथ-साथ उनमें अंतरजाल पर हिन्दी-प्रयोग की तरफ़ झुकाव भी पैदा होगा।
अंतरजाल पर हिन्दी की प्रगति की खुशी मनाने के साथ-साथ इसके उज्ज्वल भविष्य के लिए प्रयत्नरत।
आपका प्रिय/साथी चिट्ठाकार
गिरिराज जोशी “कविराज”
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Saturday, January 6, 2007 |
Posted by
गिरिराज जोशी


अपना पेट फट जाने तक हँसना भी उतना ही तय था जितना गुरूदेव का स्वर्ण कलम जीतना. 57% मतो से जीतकर गुरूदेव ने साबित कर दिया की ब्लॉग जगत में उनका स्थान उतना ही ऊँचा है जितना क्रिकेट में आस्ट्रेलिया का, विश्व में अमेरिका का और धन में बिल्लू भय्या का है। अब हमारे पास मूवी बनाने की सुविधा तो है नहीं कि मुवी बनाकर, यू-ट्यूब से सबको दिखाते की हम कितना खुश हुए हैं।
ज्योंही ही हमें पता चला कि तरकश पर बधाई संदेश प्रेषित कर अपनी खुशी का इजहार किया जा सकता है, हम तुरंत वहाँ पहूँचे और मंच पर खड़े होकर ठहाका लगाने लगे। हम काफि देर तक हँसते रहे मगर जब हमारे हँसने की आवाज हमें ही ना सुनाई दी तो हम आश्चर्य हुआ, हमें लगा कि तरकश डोट कॉम ने मुझे वायरस समझकर हमारी हँसी को ब्लॉक कर दिया है। हमने तुरन्त संजय भाई को बतलाया कि हम हूँ, कोई वायरस नहीं है भाई!!! उन्होने भी अपने प्रोग्राम को समझाया, मगर वो मानने को तैयार ही नहीं हुआ। टिप्पणी लिखें टेग के निचे सुदर्शन चक्र करीब आधे घंटे तक ऐसे घुमाता रहा, मानो मेरा वध करके ही मानेगा। आखिरकार हम भी डरकर भाग लिये, क्या पता ससुरा सच में गर्दन उड़ा दे।
फिर हमें याद आया कि हमारा अपना चिट्ठा भी तो है, क्यों ना वहाँ जाकर हँसा जाए -
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सभी विजेताओं को गिरिराज व कविराज की ओर से बहुत-बहुत बधाई!!!!
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संदेश,
हास्य-व्यंग्य
Thursday, January 4, 2007 |
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गिरिराज जोशी
हमारा मन याने के ‘कविराज’ आजकल नालायक हो गया है, पता नहीं किस बात से नाराज है और हमसे किस बात का बदला ले रहा है। इसकी नालायकी के किस्से सुनाऊँगा तो आप दंग रह जायेंगे। अभी दो दिन पहले गुरूदेव से गपशप पर वार्तालाप हुई, वो जरा जल्दी में थे तो बोले – “शाम को मिलते हैं।” मैं रात्रि 10 बजे तक इंतजार करता रहा मगर गुरूदेव नहीं आये, फिर समझ में आया कि वो तो कनाडा में है और कनाडा में जब शाम होगी तक मिलेंगे। मुझे अपनी इस बेवकूफी पर हँसी आने लगी, मगर कविराज के दिमाग में कुछ और ही पक रहा था। हमारी हँसी के रूकने तक तो कुछ नहीं बोला, मगर ज्योंही हमारी हँसी रूकी, अपना राग अलापना शुरू कर दिया.
”क्या कहते हो गिरू भाई? इस घटना पर तो एक मजेदार पोस्ट लिखी जा सकती है, और शब्दों को भांड बनाकर सागर भाई को हँसाया जा सकता है।“
अब मैं क्या कहता, सागर भी को हँसाने का दिल भी कर रहा था मगर खुद को बलि का बकरा बनाया जाना भी अच्छा नहीं लग रहा था, सो थोड़ा सोच-विचारकर गर्दन को 5-7-5 बार ऊपर निचे हिला दिया। मगर नालायक का यह मुख्य गुण है कि वो सिर्फ़ अपने बारे में ही सोचता है और मेरे नालायक मन ने भी यही किया, मुझको उकसाया कि चैट बॉक्स में जाकर अग्रिम प्रचार करूँ और मैं भी झांसे में आकर चैट बॉक्स खंगालने लगा। सर्वप्रथम गुरूदेव के ही दर्शन हुए सो मैने उनको बोल दिया -
गुरूदेव प्रणाम, कल जब आप शाम को मिलने का कह गये थे तो मैं यह नहीं समझ पाया की आप भारतीय शाम की बात कर रहें है या फिर कनाडीय शाम की, इसी दुविधा में जो कुछ घटा चिट्ठे पर लिख रहा हूँ. आशीर्वाद दीजिये.
गुरूदेव के मन मैं तो आया होगा कि क्या बकवास है, कहीं इसकी नालायक की वजह से मेरा चुनाव खतरे में तो नहीं पड़ जायेगा? मगर जैसा कि सर्वविदीत है कि चेला चाहे कैसा भी हो गुरू का दिल हमेशा उसके लिए दुआएँ ही करता है, मन मारकर गुरूदेव ने आशीर्वाद दे दिया.
मगर यहीं से हमारे नालायक मन ने अपना खेल-खेलना शुरू किया, मन के गलियारे से मुझे सूचना मिली कि उसने पाला बदल लिया है और अब गुरूदेव साथ हुई वार्तालाप के असमंजस को पोस्ट में नहीं लिखेगा। खेद व्यक्त कर उसने आगे कहा कि कुछ परिपक्व मसाला परोसेगा क्योंकि नये साल में कुछ नया नहीं करेगा तो फिर साल नया कैसे?
मैने बहुत समझाया कि मैं गुरूदेव को बोल चुका हूँ कि पोस्ट लिख रहा हूँ और अब तुम मेरा साथ नहीं दोगे तो मैं उनको क्या जवाब दूँगा मगर उस पर कोई असर नहीं हुआ। हिम्मत करके डांटा तो गिरियाने लगा कि अगर मैने तेरा साथ ‘परमानेंट’ छोड़ दिया तो फिर तेरी हालत पपीते के छिलके जैसी हो जायेगी, कोई सुंघने भी नहीं आयेगा। मजबूरी क्या नहीं करवाती। मगर एक अच्छी सलाह भी दी उसने, कहा कि जब आप किसी कार्य के लिए आत्मनिर्भर ना हो या अपने बूते से ना कर सको तो उसका ढ़िंढ़ोरा भी नहीं पीटना चाहिये।
खेर बात यहीं तक होती तो मैं सह लेता मगर इसके बाद तो उसने हद ही कर दी। सागर भाई बेचारे नेट नहीं चलने के कारण परेशान थे और नेट प्रोवाईडर पर खीज रहे थे। उनको शांत करने के लिए कविताएँ मेल कर दी। सागर भाई मुझ पर बिफर पड़े। इस नालायक की वजह से बहुत सुनने को मिला, लगता है अब फिर से हंसाओ अभियान चलाना पड़ेगा।
मैने सागर भाई को यह कहकर शांत किया कि यह कविताएँ आपके नेट प्रोवाईडरों के लिए है उनको मेल कर दीजिये, आपकी समस्या का समाधान हो जायेगा। मैं 100 प्रतिशत गारंटी लेता हूँ. कविताओं में कुछ शब्दों का प्रयोग स्थितीविशेष था, जिनके अर्थ यहाँ दे रहा हूँ -
श्रोता-श्राद्ध-परियोजना -> यह श्रोता की अंतिम इच्छा को ध्यान में रखकर बनाई गई परियोजना है, जिसमें श्रोता के निकटतम पाँच स्त्रुओं को तीन-तीन कविताएँ सुनाई जायेगी.
कष्ट-निवारक-गलियारा -> यह शब्द कविराज ने अपनी उन पंक्तियों के लिए प्रयुक्त किया है जिनको पढ़ने के बाद श्रोता पूर्णकालिक कष्ट मुक्त हो जाता है.
अर्द्धचेतन-नृत्य -> काव्य-रस में लीन होकर जब श्रोता झुमने लगता है तो इसे अर्द्धचेतन-नृत्य कहा है, क्योंकि यह कार्य कवि के सम्मुख पूर्ण होशोहवास में नहीं किया जा सकता।
मातृ-चरण-वंदन -> झुमते-झुमते जब श्रोता निढ़ाल होकर मुँह के बल धरती माता के चरणों मे गिर जाता है तो उस स्थिती के लिए इस शब्द का प्रयोग हुआ है।
सागर भाई, इनके अलावा और भी कोई शब्द ऐसा हो जिसका प्रयोग समझने में आपको दिक्कत आती हो तो यहाँ टिप्पणी के रूप में पूछ लिजियेगा।
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हास्य-व्यंग्य
Monday, January 1, 2007 |
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गिरिराज जोशी
नववर्ष का स्वागत विश्व भर में जोश-खरोश के साथ किया जा रहा है, जहाँ नववर्ष महोत्सव से ठीक पूर्व अपदस्थ ईराकी राष्ट्रपति सद्दाम को फांसी पर चढ़ा दिया गया तो वहीं नोएडा के एक घर में मिल रहे नर-कंकाल मानवता को शर्मसार कर रहें है। खेर जमाना आगे बढ़ने का है। "जो कुछ हुआ, हो चुका, भूलो और आगे बढ़ो" अप्रकाशित आधुनिक गीता का प्रमुख स्लॉगन है।
नववर्ष पर चहुँओर दुआएँ मांगी जा रही है, खुशहाली के लिए प्रार्थनाएँ की जा रही है, सामंजस्य और भावनात्मक लगाव का यह प्रवाह अनंत काल तक बहता रहे, इसके लिए प्रयास किए जाने जरूरी है। सबकुछ ऊर्जा पर निर्भर करता है। सामंजस्य बनाने के लिए जरूरी है कि आप दूसरे व्यक्ति में हमेशा अच्छाई और योग्यता देखें यानि आपका नज़रिया महत्वपूर्ण हैं। आपको दूसरों से सर्वश्रेष्ठ तभी प्राप्त हो सकता है, जब आप अपना सर्वश्रेष्ठ उन्हें देते हैं। जीवन में आनन्द पाने के लिए आप उन सभी चीजों और लोगों के साथ सामंजस्य बनाएँ, जो आपके सम्पर्क में आते हैं। भावनात्मक लगाव उस वक्त तक हासिल नहीं हो सकता, जब तक आपका प्यार शर्तरहित नहीं है। यदि दोनो पक्षों में से कोई भी पक्ष स्वार्थी है तो भावनात्मक बंधन ढ़ीला ही रहेगा। इसलिए जीवन में आनंद का रस घोलने के लिए अपने जीवनसाथी, बच्चों और मित्रों के साथ भावनात्मक बंधन को मजबूत करते रहें। हर व्यक्ति किसी ना किसी के प्रति जवाबदेह होता है। जवाबदेही वह गोंद है जो समाज को जोड़े रखती है। सामाजिक बंधन निर्धारित करता है कि हमें एक-दूसरे के साथ किस तरह व्यवहार करना चाहिए कि दूसरा पक्ष हम पर दोषारोपण नहीं कर सके।
कुछ समय पहले फ़ुरसतियाजी ने अपनी पोस्ट में हँसी की बेटी का जिक्र किया था जिसका नाम मुस्कान है और जिसमें हँसी से कहीं ज्यादा ज़ान हैं। अपने फ़ुरसतियाजी की तरह मिशनरीज ऑफ चेरिटी की संस्थापक मदर टेरेसा जी भी मुस्कान को ही सबसे बड़ी दवा मानती थी। मुस्कान की कोई कीमत नहीं है, मगर यह बहुत कुछ देती है, यह देने वाले को गरीब किये बिना पाने वाले को अमीर कर देती है। यह मनोवैज्ञानिक असर दिखाती है और जीवन में उल्लास भर देती है। अगर आप मुस्कुराने की आदत डाल लेंगे तो खुद को प्रसन्नचित भी महसूस करेंगे। मुस्कुराने से एक और फायदा है, आप जितना मुस्कुराते हैं, असफलता का डर उतना ही कमजोर पड़ता जाता है। असफलता का डर हमें सफलता की कोशिश करने से रोकता है। हारने का डर हमें जीतने का प्रयत्न करने से रोकता है। लोग क्या सोचेंगे, इस बात का डर हमें बहादुरी से आगे कदम बढ़ाने से रोकता है। सबसे बड़ी बात कि, डर आशा का गला घोंट देता है। आशावाद हमारे मस्तिष्क को नकारात्मकता से दूर ले जाता है। जब आप आशावादी होते हैं तो अपनी समस्या को सुलझाने के बारे में विचार करते हैं, व्यर्थ की आलोचना करने में समय बर्बाद नहीं करते। विश्वास की जड़ें अक्सर इस तर्कहीन आशा में होती हैं कि सब कुछ ठीक हो जाएगा। विश्वास की कमी की वजह से अपने सपनों का दम न घुटने दें।
नववर्ष पर तरकश का चिट्ठाकारी के प्रोहत्साहन के लिए किया जा रहा प्रयास भी सरहानिय है, हाँलाकि मुझे 2006 के सर्वश्रेष्ठ चिट्ठाकारों की सूचि में जगह नही मिली, मगर फिर भी मेरा जो उत्साहवर्धन हुआ है, मेरे लिए अमूल्य है। सूचि में जो आश्चर्यजनक पहलू रहा वो यह कि कविता लिखने वाले चिट्ठाकार स्थान नहीं बना पाये, अकेले गुरूदेव ही डटे है। सभी जज इतने मंजे हुए चिट्ठाकार है कि यह कहना भी तर्कसंगत नहीं लगता कि ऐसा इसलिए है कि उनमें से कोई कवि नहीं है क्योंकि कवि न होते हुए भी सभी कविता की गहराई को समझते है। जिस प्रकार चुटकले और सरदार एक दूसरे के पर्याय बन गये है वैसे ही कवि और बोरियत। आजकल कविता सुनने या पढ़ने वाले को "कवि-तड़ित-प्राणी" की संज्ञा दी जाने लगी है और काव्य से श्रोताओं का संहार करना ही कवि-धर्म माना जाने लगा है, मगर यह सत्य नहीं है. वेदों में लिखा है - "उर्ध्वश्वत्थमूलमिदं वृक्षं" - कवि लोग भी वैसे ही हैं, इनका मूल उपर है ब्रह्म में... खेर अभी भी गुरूदेव डटे हुए हैं, वे सभी प्रतिपक्षियों को पराजित करने को उद्यत हैं। विजय का वरण वे ही करेंगे। अब कवि मताधिकार का प्रयोग करेंगे, गुरूदेव का विजय होना निश्चिंत है। श्रीशजी, भुवनेशजी के लिए दिल बहुत खुश है, आखिर बहुत कम समय में उन्होने अपनी एक खास जगह बना ली है। अब आगे मुकाबला और भी दिलचस्प होगा।
नववर्ष पर सभी को हार्दिक शुभकामनायें देते हुए कुछ पंक्तियाँ गुनगुनाना चाहूँगा -
ढ़ल गया दिन ढ़ूँढ़ता था
सपनों में खोया रहता था
ना आए पिछे साया भी
पदचिन्ह अपने मिटाता था
डर को अब भगायेंगे
जश्न नववर्ष का मनायेंगे
संबोधन पुराना घेरता मन को
ज्यों प्रवासी लौट आया घर को
रहा गया कृषक बीज बोए बिन
तकता रहा त्यों मैं बदली को
खुशी के जाम छलकायेंगे
जश्न नववर्ष का मनायेंगे
कुछ फैसले सुनाकर जो
विश्वास जगाया जनता में
नहीं बच पाए मंत्री-संत्री
धकेला पिछें सलाखों के
बस यूँही न्याय चाहेंगे
जश्न नववर्ष का मनायेंगे
क्या औकात है किसकी अब
हुआ जरूरी तो बतलायेंगे
मिलजुल कर रहेंगे हम
भारत को जन्नत बनायेंगे
जश्न नववर्ष का मनायेंगे
जश्न नववर्ष का मनायेंगे
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