यह क्या किया प्रमेन्द्र?

Wednesday, June 20, 2007 |

भाई प्रमेन्द्र, आपको याद होगा, अभी कुछ दिन पूर्व आपने अपनी 100वीं पोस्ट की खुशी व्यक्त करते समय हमारी मित्रता का ख्याल रखा था और आपने स्वयं को मिले प्रस्ताव को मेरी तरफ़ रिडायरेक्ट कर दिया था। तुमने जो हाई रिस्क लेते हुए मध्यस्थता करने का साहस किया है उसके लिये तुम्हारा तह दिल से आभारी हूँ। तुम्हारे जैसे मित्र विरले ही मिलते है, मैं धन्य हुआ। मगर मित्र तुमने अपनी कड़ी मेहनत को दरकिनार कर इसका श्रेय नारद को दिया, यहाँ तुमसे अनजाने में एक भूल हो गई और जो आग लगी उसमें घी का काम किया तुम्हारे द्वारा श्रीश के नाम पर विचार किये जाने को सार्वजनिक करना। वैसे तो पूरे घटनाक्रम को ही गुपचुप तरीके से किया जाना चाहिये था मगर फिर भी यदि तुम श्रीश के नाम पर विचार करने के बावजूद भी यदि उसका खुलासा न करते तो उत्तम होता।

तुम्हारी पहली गलती -

सर्वप्रथम गिरिराज जी ने नारद के समर्थन में एक पोस्ट‍ लिखी, फिर मैंने लिखा उसके बाद लिखा ब्‍लाग जगत में काफी हंगामा हुआ। गिरिराज को तो कोसा गया मुझे भी किसी ने काफी कुछ सुनाने में पुरोधा पीछे नही रहे, जो आपके सामने था। किन्‍तु जो परदे के पीछे हुआ उससे आप सभी लोग अन्‍जान है।काफी दिनों से व्‍यस्‍त था और कह नही पा रहा था किन्‍तु आज समय आ गया है कि यह बात भी आपके सामने रखी जाये। उस सर्मथन भरी साहसी पोस्‍ट का परिणाम यह हुआ कि मेरे पास एक मेल आया।मै हिन्‍दी ब्‍लाग का काफी सक्रिय ब्‍लागर हूँ, तथा मै आपकी निर्भिकता और सच्‍चाई देख कर काफी अहलादित हूँ। तथा चाहता हूँ कि आप मेरे साथ विवाह का प्रस्‍ताव स्‍वीकार करें। मै आपका का हार्दिक आभारी रहूँगीं। आप चाहें तो आपने परिवार जन से बात कर या मेरी बात हमारी करवा सकते हो। मै आपना चित्र भेज रही हूँ। तुम्‍हारी शुभ चिन्‍तक एक हिन्‍दी ब्‍लगर

किसी का निजी मेल सार्वजनिक नहीं करना चाहिये था। हालांकि तुम तर्क दोगे कि तुमने उसके नाम का उल्लेख नहीं किया मगर इससे तुम अपनी गलती को छूपा नहीं सकते। तुमने इस पोस्ट में मेरा मेल भी सार्वजनिक किया है, इसके लिये मैं सिर्फ़ तुम्हें इस कारण माफ़ कर रहा हूँ कि तुम एक नेक काम कर रहे हो।

तुम्हारी दूसरी गलती –

गिरिराज जी के उत्‍तर के पश्‍चात बात पक्‍की हो गई, और आगें की प्रक्रियॉ चालूँ हो चुकी है जल्‍द ही आपको शुभ सुचना मिलेगी। प्रतीक जी और श्रीश जी आशा है आप बुना नही मानेगें। अत: आप भी इस निर्णय को स्‍वीकार करें और पहले ब्‍लागर सगाई के घराती और बराती होने का सौभाग्‍य प्राप्‍त करें।

मात्र मेरे उत्तर देने से बात पक्की नहीं हुई वरन आगे बढ़ी थी, मगर तुमने इसे जगजाहिर कर विराम लगा दिया। प्रतीक और श्रीश दोनों ही बुरा मान गयें। हालांकि प्रतीक को तो मैने जैसे तैसे मना लिया मगर श्रीश नहीं मानें। मैने उन्हें बहुत समझाया मगर वे अड़े रहे, मुझे ललकारने लगे, कहने लगे –

“मुक़ाबला करो, कौन ज्यादा योग्यवान है, तुम ब्लॉगर हो, मैं भी हूँ, तुम पंडित हो, मैं भी हूँ, तुमने नारद के पक्ष में लिखा, मैने भी लिखा है, फिर तुम कैसे हकदार हुए?”

प्रमेन्द्र तुम तो जानते ही हो मेरा स्वभाव, मैने मन मारकर आपका प्रस्ताव श्रीश को फॉरवर्ड कर दिया, मगर तुम चिंता ना करो, मध्यस्थता करते रहो, मैं उसे भी फॉरवर्ड करता रहूँगा। हालांकि हो सकता है कि इस पोस्ट को महिला ब्लॉगर (कुंवारी) भी पढ़ें, इस कारण मेरा यहाँ यह बताना कदापि उचित नहीं होगा कि श्रीशजी ने मेरी 100 कविताएँ सुनी तब जाकर मैने उन्हें प्रस्ताव फॉरवर्ड किया है, वैसे घबराने की कोई बात नहीं है, अब वे स्वस्थ है और उन्हें छूट्टी भी मिल चुकी है। हाँ, याद्दाश्त पर जरूर असर पड़ा है, मगर मेरी डॉक्टरों से बात हुई है, वे बहुत जल्द ठीक हो जायेंगे। यहाँ मैं डॉ. प्रभात टंडन और डॉ. गरिमा के संदेश उन महिला ब्लॉगर (कुंवारी) को देना चाहूँगा (वे पढ़ेंगी ही, नहीं तो तुम पहूँचा देना) –

“श्रीश मस्तिष्‍क ज्वर से पीड़ित है, क्षमता से अधिक कविताएँ सुन लेने के कारण ऐसा हुआ है, मगर जल्दी बेहोश हो जाने के कारण उन पर गहरा असर नहीं पड़ा है, 100 कविताएँ सुन लेने के बाद स्थिति विकट हो जाती, मैं कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं होता। उनके पाठकों कि दुआओं का असर है कि वें पहले ही बेहोश हो गये। एक सप्ताह तक कोई पोस्ट न करें और कष्ट-भंजक-मस्तिष्क-ज्वर-निवारक-चूर्ण का सेवन दिन में 10001 बार 7-7 लोटा करें।“ – डॉ प्रभात टण्डन
“श्रीश की मानसिक तरंगों का अध्यन करने से यह साफ़ तौर पर पता चलता है कि उसमें अत्यधिक मात्रा में अनियंत्रित ऊर्जा है, एक साथ अत्यधिक मात्रा में कविताएँ सुन लेने से यह स्थिति पैदा हुई है, जिस वजह से उनकी याद्दाश्त पर असर पड़ रहा है। हालांकि इसका त्वरित इलाज नहीं है, मगर फिर भी यदि वें श्वेत पिरामिड में सरसों का तेल 10-12 घंटे रखकर उसका सुबह-सुबह पान करें तो सात दिवस में फायदा हो सकता है।“ – डॉ. गरिमा।


श्रीश के जल्द ही स्वस्थ होने के आसार है, जैसा की दो-दो डॉक्टर इलाज़ में लगे हैं, घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है। कुछ दिनों तक यदि वें आपसे ये पूछे - “आप कौन?” तो आप नाराज़ न होंवे, वे अभी पूर्णतया स्वस्थ नहीं है। उन्हें आप सभी के सहयोग और स्नेह की आवश्यकता है।

प्रमेन्द्र तुम्हे लग रहा होगा कि मैं अपनी गलती ढ़कने के लिये तुम्हारी गलतियाँ निकाल रहा हूँ, मगर मैं नहीं मानता कि कविताएँ सुनाकर मैने कोई गलती की है क्योंकि कविताएँ मैने उनकी मंजूरी के बाद ही सुनाई है और सुनाना शुरू करने से पूर्व उन्हें चेताया भी, मैने कविताएँ सुनाने से पहले उनसे कहा था –

चंद लोगों ने चुन ली मौत
बीच चौराहे पर फांसी लगाकर
गया था कल शाम को जिन्हें
मैं अपनी कविताएँ सुनाकर

मगर फिर भी श्रीश उस महिला ब्लॉगर (कुंवारी) को अपना बनाने के लिये इतने बेताब दिखे कि मुझे 100 की बजाय 200 कविताएँ सुनाने के लिये कहा। अब तुम से क्या छूपाना, तुम तो जानते ही हो कि मुझे 100 कविताएँ सुनाने के लिये भी कुछ इधर-उधर से मारनी पड़ी, वरना 200 क्या 500 भी सुना देता।

मुझे पूर्ण विश्वास है कि तुम श्रीश का प्रस्ताव डायरेक्ट या इनडायरेक्ट उस महिला ब्लॉगर (कुंवारी) तक पहूँचाओगे, तुम हमेशा ही नेक काम करने में अपना योगदान देते हो, तुम्हारी मित्रता पाकर मुझे बेहद खुशी है।

शाबास नारद!

Friday, June 15, 2007 |

शाबास नारद!


 

मैं जानता हूँ कि सही निर्णय के बावजूद चंद लोग लामबद्ध हो रहे है, मगर ऐसा होना जायज है, सही बात सभी को समझ आ जाये तो गलत कहाँ रह जायेगा? कुछ लोगों ने विवादित होना और विवाद करना ही चिट्ठाकारी समझ रखा है, उनकी अपनी समझ है, वे नाज़ भी करते हैं अपनी समझ पर, मगर वक्त आ गया है कि अब नारद इन्हें यह स्पष्ट रूप से समझा दें कि नारद इनका निजी ब्लॉग नहीं है, जहाँ ये लोग अपनी मनमानी कर सकते हैं। स्वतंत्रता का मतलब यह नहीं की किसी के घर में पत्थर मारे जाये, यह बात इनको समझाना आवश्यक है। नारद से ऐसे सभी चिट्ठों को निकाल फैंको जो इसका विरोध करते हैं, मेरी इस बात को दमनकारी कहा जायेगा, तानाशाही कहा जायेगा, कहने दो... क्योंकि जब पानी सर के ऊपर से जाने लगे तो हाथ-पैर मारना आवश्यक हो जाता है। ये लोग गाली-गलौच करके इतिहास बनाना चाहते है, बेशक बनाये, मुझे कोई आपत्ति नहीं है मगर नारद जैसा सार्वजनिक मंच इसका ग्वाह बने, इससे आपत्ति है।


 

ये लोग आंतकवादी से भी ख़तरनाक है, ये हमेशा आग लगाने की फिराक में रहते है, ग्रुप बनाकर चलते है, एक मित्र आग लगता है, दूसरा फूँक मारता है और तीसरा तेल छीड़कता है, पूरे ग्रुप को नारद से निकाल फैंको, एक-एक चिट्ठे को हटाने से कुछ नहीं होता, सहनशीलता की भी एक सीमा होनी चाहिये, आखिर कब तक सहोगे?



 

 



वैचारिक लड़ाई की बात करने वाले ये लोग अपने अख़बार/चैनल को माध्यम क्यों नहीं बनाते, उन्हें पता चल जायेगा कि सर छूपाने को भी जगह मिलती है या नहीं। गुजरात-कांड को बार-बार हवा देकर ये लोग क्या साबित करना चाहते है? कथित तौर पर शिकार हुए लोगों को भड़काओ, फिर से गुजरात जलाओ, कहीं यही तो इनका मकसद नहीं, मुझे नहीं लगता कि इनको किसी भी इंसान से भावनात्मक लगाव होगा, यदि फायदा हो तो ये किसी का भी तमासा बना सकते है....छी: 



नारद ने जो कदम उठाया, मैं उसका समर्थन करता हूँ, और आग्रह करता हूँ कि ऐसे दो चार कदम और उठाते हुए इस पूरी नस्ल को ही नारद से निकाल फैंको।

हम भी कुछ लाने को हूँ भाई!

Wednesday, June 6, 2007 |

हिन्दी ब्लॉगर लोग आजकल बहुत तरक्की कर लिये है, अपन ईच साला घिसट-घिसट कर चलता है। साला सब लोग कहता है कि साईकिल खरीद लो, जुते घीस गये है, कहाँ घीसे हैं, मुझे समझ नहीं आ रहा है, आप देखिये, ई फ्रंट एंड है






अब ई देखिये, ई बेक एंड है -









ये आपको कहाँ से घीसेले दिखते है, इनको अभी कम से कम दो-चार साल तो चलाया जा ही सकता है, अरे भाई अब ब्लॉगरवा हूँ तो इसका मतलब ये तो नहीं कि टिप्पणी के एवज में सब बात मान लूँ, ऐसा थोड़े ही ना होता है। साईकिलवा आजकल बहुत महंगा हो गया है, 1500 रूपये से कम का नहीं आता, पिछली बार जब हम नये जुते लाये थे तो पुराने जुते का ई हाल था -






फिर भी जबरदस्ती लाये थे, बहुत दबाव था हम पर, खेर इस बार दवाब कम लालच ज्यादा है, टिप्पणियों का। दुकानदार से सबसे सस्ते जुते का फोटू लाया हूँ, साला फोकट में फोटू भी ढ़्ग से नहीं लेने दिया, दो फोटवा खिंच लाया हूँ, एक फ्रंट एंड का है और दूजे में पूरी जोड़ी दिख रही है -



      






अपन को तो ऐश-अभी की माफिक खूबसूरत जोड़ी लगी है इसलिये दो साल बाद खरीदने का विचार किया जा सकता है। आप क्या कहते हैं?