वाह राज वाह!
अरब के पास “ओसामा”, युरोप के पास “बुश”... भाई! एक हम ही बचे थे खाली हाथ... ले दे के हमारे पास उभरते “मोदी”... मगर वो भी पिछले कुछ समय से कलटी मार गये... “गोधरा” के बाद एक बार तो लगा कि “मोदी” पर फक्र किया जा सकता हैं मगर उसके बाद वे पलट गये... विकास में लग गये... ऐसे मैं “हिन्दु तालिबान” का सपना बिखरता सा प्रतित होने लगा था... बहुत टाईम से “गिल्टी फील” हो रहा था.. शाबास राज! फिर से एक उम्मीद जगाने के लिये।
तेरा “मराठी माणुस की मुम्बई!” वाला विचार बहुत शानदार रहा, मुम्बईया भाषा में बोले तो एकदम “झक्कास!”, अखी मुम्बई हिल ग्यैली है, चारो ओर तेराईच फोटो है...तेरेईच चर्चे हो रेले हैं। कम से कम एक बार फिर से ज्ञात तो हुआ कि “आंतक” केवल एक कॉम का काम नहीं है, कोई भी फैला सकता है... बस तेरे जैसे दबंग नेता की जरूरत है।
मैने टेलिविजन पर दिखाये गये विडियो सेव कर लिये हैं... काम आयेंगे... बचपन में जब पढ़ता था कि एक राजा ने जबरदस्ती लोगों का धर्मांतरण किया था तो सोचता था कि यह सब कैसे हुआ होगा.. मगर अब जब तेरे आदमियों की लाठियाँ खाकर लोगों को रोते हुए “जय महाराष्ट्र! जय महाराष्ट्र!” बोलते देखता हूँ तो सब आसानी से समझ आ जाता है।
तेरे समर्थन में तेरी सेना ने “जिसकी लाठी उसकी भैंस” मुहावरे को भी बदलकर “जिसकी लाठी उसकी मुम्बई” कर दिया है, उनकी लाठियों से क्या मस्त गाना निकला है! एकदम रापचिक -
गाना : सुनो गौर से यूपी वालो ...
संगीतकार : मनसे के सेनिकों की लाठियाँ
गीतकार : राज ठाकरे
गायक : चंद सिरफिरे मराठी माणुस!
सुनो गौर से यूपी वालों,
तुम भी वोटिंग हमको डालो
वरना कैसे कमा के खालो..
लाठी ले के घूम रहे मराठी..
सुनो गौर से यूपी वालों ...
हम मारे या काटे सह लो
फिर चाहे जब तक रह लो
हम बुलायें पीट-पीट पर यारा
“जय जय जय महाराष्ट्र हमारा”
हम मारे या काटे सह लो ओ ओ
जलते शरारे पानी के धारे
हम कानून से डरते नहीं
ठान ले जो वो करके रहते
कदम पीछे धरते नहीं
वक़्त है उम्र है जोश है और जान है
बस हर कीमत पर वोट अपनी शान है
हम मारे या काटे सह लो ओ ओ...
दिल में नफरत दिमाग मे गफ़लत
भर दे हम वो वज़ीर हैं
सबको डराना यही है इरादा
हम कल की तस्वीर हैं
वोट नहीं तो दे दो जान
मुम्बई भी कर दे कुर्बान
हाँ......
वोट नहीं तो जान चाहिये
हमारी लाठी सहते जाईये....
हम मारे या काटे सह लो ओ ओ...
सुनो गौर से यूपी वालो...
Wednesday, February 6, 2008 |
Posted by
गिरिराज जोशी
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हास्य-व्यंग्य
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11 comments:
bilkul sahee hai Giriraj.
Ek tum Raj ho aur ek vo Raj.
Avaneesh
आपने हास्य व्यंग्य के लिहाज से लिखा होगा गिरिराज भाई, अपनी तो आँखें भर आईं।
आपकी जो बातें उठाई है वह सही है किन्तु “हिन्दु तालिबान” का सपना बिखरता सा प्रतित होने लगा था... शब्द मन को चोट कर रहा है।
वैसे महाश्राष्ट्र की घटना निन्दनीय है।
जिस दिन हम यह सोच सकें कि जो पिट रहे थे , जिनकी टैक्सी आदि जलाई जा रही थी वे हम भी हो सकते थे । या फिर जो आज यहाँ हम कर रहे हैं वही कल किसी और राज्य या देश में हमारे साथ हो सकता है तो सब समस्याएँ समाप्त हो जाएँ ।
घुघूती बासूती
पता नही इस सबका क्या अंत होगा।
सही जोशी जी, अगर ऐसे ही चलता रहा तो मुझे तो लगता है कि
प्रदेश का प्र जल्द हट जायेगा..
शायद देश फिर बँट जायेगा..
अपनी अपनी ढपली के संग
अपना अपना राग होगा..
सच में देश का दुर्भाग होगा..
झन्डे नही केवल झंडे के डंडे बटेंगें.
और फिर एक 1947 आयेगा..
फिर लोग मरेंगे.. फिर कटेगे..
बूढों का सहारा लाठी जब
युवाओं का सहारा बन जायेगा..
तब जाकर इन सरफिरों को
समझ आयेगा..
बिल्कुल फिट भाई!
:)
बहुत ही करारा व्यंग किया है .आपने गिरिराज जी इस रचना के मध्याम से ...पर यह सब करने वाले अपने स्वार्थ में डूब चुके हैं !!अंत क्या होगा इसका ?
गिरिराज जी.. आज की भेद -अलगाव की राजनीति पर आप की लेखनी ज़बरदस्त चोट करती है...पर हमारी सभ्यता-संकृति ने "वैष्णव " बनकर सहते जाने का जो पाठ पदाया है..उसका ये अवसरवादी गलत फायदा उठाते है..
AAP KI BAAT 100 TAKKA SAHI HAI
HUM SAB KO MIL KAR US RAJ KA RAJ BAND KARNA HOGA.MAIN AAPKE SAATH HU AAP LIKHTE RAHIYE.
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